कबीर दास के दोहे हिंदी अर्थ सहित---kabir das dohe,kabir dohe

यंहा हमने कबीर के प्रसिद्ध, लोकप्रिय एवं बहु चर्चित दोहों का हिंदी अर्थ सहित संग्रह किया है, आशा है आपको यह कबीर के दोहों का संग्रह पसंद आएगा |

(1)

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,

आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है। इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।

(2)

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा |

(3)

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।

(4)

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन।

कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन।

अर्थ:- कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया।

 कबीर दास जी कहते है कि अब भी यह मन होश में नहीं आता। आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है।

(5)

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,

ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।

अर्थ:- इस संसार में आकर कबीर दास जी अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो |

(6)

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई।

बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।

अर्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए। बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।

(7)

करता रहा सो क्यों रहा,अब करी क्यों पछताय ।

बोया पेड़ बबुल का, अमुआ कहा से पाये ।।

अर्थ :- कबीर दास जी कहते है कि जब तू बुरे कार्यो को करता था ,संतो के समझाने से भी नही समझ पाया तो अब क्यों पछता रहा है ।जब तूने काँटों वाले बबुल का पेड़ बोया है तो बबूल ही उत्पन्न होंगे ।आम कहाँ से मिलेगा । अर्थात जो मनुष्य जैसा कर्म करता है बदले में उसको वैसा ही परिणाम मिलता है ।

(8)

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि – गढ़ि काढ़ै खोट।

अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि गुरु कुम्हार है और शिष्य घड़ा है,भीतर से हाथ का सहार देकर, बाहर से चोट मार – मारकर और गढ़ – गढ़ कर शिष्य की बुराई को निकलते हैं।

(9)

 जो गुरु बसै बनारसी, शीष समुन्दर तीर।

एक पलक बिखरे नहीं, जो गुण होय शारीर॥

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि यदि गुरु वाराणसी में निवास करे और शिष्य समुद्र के निकट हो,परन्तु शिष्ये के शारीर में गुरु का गुण होगा, जो गुरु लो एक क्षड भी नहीं भूलेगा।

(10)

गुरु मूरति आगे खड़ी, दुतिया भेद कुछ नाहिं।

उन्हीं कूं परनाम करि, सकल तिमिर मिटि जाहिं॥

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि गुरु की मूर्ति आगे खड़ी है,उसमें दूसरा भेद कुछ मत मानो। उन्हीं की सेवा बंदगी करो, फिर सब अंधकार मिट जायेगा।

(11)

कहै कबीर तजि भरत को, नन्हा है कर पीव।

तजि अहं गुरु चरण गहु, जमसों बाचै जीव॥

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि भ्रम को छोडो, छोटा बच्चा बनकर गुरु –वचनरूपी दूध को पियो।इस प्रकार अहंकार त्याग कर गुरु के चरणों की शरण ग्रहण करो, तभी जीव से बचेगा।(12)

अबुध सुबुध सुत मातु पितु, सबहिं करै प्रतिपाल।

अपनी ओर निबाहिये, सिख सुत गहि निज चाल॥

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि मात – पिता निर्बुधि –बुद्धिमान सभी पुत्रों का प्रतिपाल करते हैं। पुत्र कि भांति ही शिष्य को गुरुदेव अपनी मर्यादा की चाल से मिभाते हैं।

(13)

सतगुरु तो सतभाव है, जो अस भेद बताय।

धन्य शिष धन भाग तिहि, जो ऐसी सुधि पाय॥

अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि सद् गुरु सत्ये – भाव का भेद बताने वाला है| वह शिष्य धन्य है तथा उसका भाग्य भी धन्य है जो गुरु के द्वारा अपने स्वरुप की सुधि पा गया है|

(14)
जग में युक्ति अनूप है, साधु संग गुरु ज्ञान।
तामें निपट अनूप है, सतगुरु लगा कान॥
अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि दुखों से छूटने के लिए संसार में उपमारहित
युक्ति संतों की संगत और गुरु का ज्ञान है|
उसमे अत्यंत उत्तम बात यह है कि सतगुरु के वचनों पार कान दो|
(15)
सतगुरु खोजे संत, जीव काज को चाहहु।
मेटो भव के अंक, आवा गवन निवारहु॥
अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि ऐ संतों – यदि अपने जीवन का कल्याण चाहो,
तो सतगुरु की खोज करो और भव के अंक अर्थात छाप,
दाग या पाप मिटाकर, जन्म – मरण से रहित हो जाओ|
(16)
जनीता बुझा नहीं बुझि, लिया नहीं गौन।
अंधे को अंधा मिला, राह बतावे कौन॥
अर्थ:- कबीर दास जी कहते है कि विवेकी गुरु से जान – बुझ – समझकर परमार्थ – पथ पर नहीं चला| अंधे को अंधा मिल गया तो मार्ग बताये कौन|

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